|
ردیف |
شرح کالا |
شرکت سازنده |
|
1 |
استارت 206 |
VALEO |
|
2 |
استارت 206 |
REAL |
|
3 |
استارت 405 |
REAL |
|
4 |
آفتامات دينام پژو 405 |
ORGINAL |
|
5 |
آينه برقي زانتيا چپ |
SPI |
|
6 |
آينه برقي زانتيا راست |
SPI |
|
7 |
استپ موتور پیکان |
SEMENS |
|
8 |
استپ موتور 206 |
SEMENS |
|
9 |
استپ موتور 405 |
SEMENS |
|
10 |
اورينگ دلكو 405 |
ORGINAL |
|
11 |
بلبرینگ کلاچ پژو 405 |
SKF |
|
12 |
بلبرينگ تسمه تايم 405 سمند پرشيا |
OMCAR |
|
13 |
بلبرينگ چرخ جلو 405 |
OMCAR |
|
14 |
بلبرينگ چرخ عقب 206 |
OMCAR |
|
15 |
بوش اكسل پژو 206 |
KLEBER |
|
16 |
بوش جناقي 405 |
ORGINAL |
|
17 |
بوش دسته موتور گرد 206 تيپ 2 |
GLOBAL |
|
18 |
بوش دسته موتور گرد 206 تيپ 5 |
GLOBAL |
|
19 |
بوش دسته موتور گرد بزرگ 405 |
GLOBAL |
|
20 |
بوش دسته موتور گرد كوچك 406 |
GLOBAL |
|
21 |
بوش طبق گرد بزرگ 206 تيپ 2 |
F.K.Z |
|
22 |
بوش طبق گرد کوچک 206 تيپ 2 |
F.K.Z |
|
23 |
بوش دو شاخه رام 405 |
KLEBER |
|
24 |
بوش طبق جناقي پژو 405 |
ORGINAL |
|
25 |
بوش طبق گرد بزرگ 206 تيپ 2 |
GLOBAL |
|
26 |
بوش طبق گرد کوچک 206 تيپ 2 |
GLOBAL |
|
27 |
بوستر ترمز 405 |
BENDIX |
|
28 |
پلوس بلند 405 آلمانی |
GKN |
|
29 |
پلوس چپ 405 کوتاه |
شتابکار |
|
30 |
پمپ بنزين 206 تيپ 2 |
ORGINAL |
|
31 |
پمپ بنزين برقي پژو |
ORGINAL |
|
32 |
پمپ بنزين 405 |
BOSCH |
|
33 |
پمپ شتاب كاربراتور پژو 405 |
ORGINAL |
|
34 |
پيستون و خار و گژنتپن با رینگ RIKپيکان 020 |
AMP |
|
35 |
پيستون و خار و گژنتپن بارینگ RIKپيکان استاندارد |
AMP |
|
36 |
تايپت سوپاپ پژو GL |
ORGINAL |
|
37 |
تايپت موتور پژو 405 |
ORGINAL |
|
38 |
ترموستات 206 |
VERNET |
|
39 |
ترموستات 405 (75درجه) |
VERNET |
|
40 |
ترموستات 405 (89درجه) |
VERNET |
|
41 |
تسمه تايم 405 ( 114 دندانه ) |
CONTITECH |
|
42 |
تسمه موتور 108 دنده پژو 206 |
ORGINAL |
|
43 |
تسمه موتور 113 دنده پژو 405 |
ORGINAL |
|
44 |
تسمه موتور 114 دنده پژو 405 |
ORGINAL |
|
45 |
تسمه موتور 104 دنده پژو 206 |
ORGINAL |
|
46 |
تسمه موتور 134 دنده پژو 206 |
ORGINAL |
|
47 |
تسمه موتور 136 دنده پژو - زانتيا |
ORGINAL |
|
48 |
توپي سر كمك پژو 405 |
ORGINAL |
|
49 |
توپي چرخ جلو 206 |
شركتي ايساكو |
|
50 |
توپي چرخ جلو 405 |
شركتي ايساكو |
|
51 |
تيغه برف پاكن 405 |
VALEO |
|
52 |
تیغه برف پاکن بزرگ سمند |
VALEO |
|
53 |
تیغه برف پاکن کوچک سمند |
VALEO |
|
54 |
تیغه جلو 206 ( راست) |
VALEO |
|
55 |
تیغه جلو 206 (چپ ) |
VALEO |
|
56 |
چراغ جلو 206 چپ |
VALEO |
|
57 |
چراغ جلو 206 راست |
VALEO |
|
58 |
حسگر دورموتور |
N.G.K |
|
59 |
خار فلزي كلاچ 405 |
ORGINAL |
|
60 |
درب رادیاتور 405 اورجینال |
PEUGEOT |
|
61 |
درب سوپاپ انژكتور پارس |
شركتي ايساكو |
|
62 |
دسته موتور 2 سر پیچ 405 |
PEUGEOT |
|
63 |
دسته موتور گرد 405 |
PEUGEOT |
|
64 |
دنده دو پیکان طلایی |
METAL CASTELLO |
|
65 |
دنده دو پیکان طلایی |
METAL CASTELLO |
|
66 |
دنده دیشلی پیکان |
METAL CASTELLO |
|
67 |
دنده کیلو متر 405 بزرگ |
PEUGEOT |
|
68 |
دنده کیلو متر 405 کوچک |
PEUGEOT |
|
69 |
دوسرپیچ هیدرولیک 405 |
F.K.Z |
|
70 |
دوسرپیچ206 تیپ 2 |
F.K.Z |
|
71 |
دو شاخ كلاچ 405 |
ORGINAL |
|
72 |
دیسک و صفحه بلبرینگ 206 |
VALEO |
|
73 |
دیسک و صفحه بلبرینگ پیکان |
LUK |
|
74 |
دیسک و صفحه بلبرینگ کلاج 405 |
LUK |
|
75 |
دیسک و صفحه کلاچ آرژانتینی پیکان |
COME |
|
76 |
دیسک و صفحه کلاچ معمولی پیکان |
COME |
|
77 |
دیسک و صفحه وبلبرینگ 405 |
COME |
|
78 |
دیسک وصفحه کلاج 405 |
VALEO |
|
79 |
دینام 405 |
VALEO |
|
80 |
رادیاتور آب 405 |
VALEO |
|
81 |
رله فن 206 سبز |
PEUGEOT |
|
82 |
رله كلاهك دار 405 |
ORGINAL |
|
83 |
رله مقاومت فن پژو 206 |
ORGINAL |
|
84 |
رینگ موتور پیکان 020 ژاپن |
RIK |
|
85 |
رینگ موتور پیکان استاندارد ژاپن |
RIK |
|
86 |
رينگ موتور پژو 1600 CC |
ORGINAL |
|
87 |
رينگ موتور پژو 2000 CC |
ORGINAL |
|
88 |
رينگ موتور پژو 206-1600 CC |
ORGINAL |
|
89 |
رينگ موتور پژو 206-1400 CC |
ORGINAL |
|
90 |
رينگ موتور پژو 504 GL |
ORGINAL |
|
91 |
رينگ موتور پژو 504 GL |
ORGINAL |
|
92 |
رينگ موتور پژو پرشيا |
ORGINAL |
|
93 |
سنسور اکسیژن پژو 405 |
BOSCH |
|
94 |
سنسور اکسیژن پیکان |
BOSCH |
|
95 |
سنسور سرعت 405 |
SAGEM |
|
96 |
سنسور حرارات سرآبي 3 فيش 206 |
ORGINAL |
|
97 |
سنسور حرارات سرسبز 206 |
ORGINAL |
|
98 |
سوئیچ پژو 405 سه كاره كولر |
SAMFAR |
|
99 |
سوزن انژكتور 206 و پيكان |
SAGEM |
|
100 |
سوزن سوخت پاش كاربراتور 405 |
ORGINAL |
|
101 |
سه شاخه پلوس 405 ( 21 خار ) |
ORGINAL |
|
102 |
سه شاخه پلوس 405 ( 22 خار ) |
ORGINAL |
|
103 |
سه شاخه پلوس 405 ( 34 خار ) |
ORGINAL |
|
104 |
سیبک زیر کمک 1800 |
FORM PART |
|
105 |
سیبک زیر کمک 2000 |
FORM PART |
|
106 |
سیبک فرمان 206 چپ |
FORM PART |
|
107 |
سیبک فرمان 206 راست |
FORM PART |
|
108 |
سیبک فرمان 405 چپ |
FORM PART |
|
109 |
سیبک فرمان 405 راست |
FORM PART |
|
110 |
سیلندرترمزچرخ عقب206 ( راست) |
T.R.W |
|
111 |
سیلندرترمزچرخ عقب206 (چپ ) |
T.R.W |
|
112 |
سیلندرترمزچرخ عقب405 ( راست) |
T.R.W |
|
113 |
سیلندرترمزچرخ عقب405 (چپ ) |
T.R.W |
|
114 |
سيم سنسور حراراتي پژو 405 |
ORGINAL |
|
115 |
سیم کلاج پیکان پژو |
DURA |
|
116 |
سیم کلاج 405 - معمولی |
DURA |
|
117 |
سیم کلاج انژکتور 405- پارس - سمند |
DURA |
|
118 |
شفت کوتاه وانتی طلایی |
METAL CASTELLO |
|
119 |
شمع 206 تيپ 5 |
BOSCH |
|
120 |
شمع 405 تک پلاتین انژکتور |
BOSCH |
|
121 |
شمع 405 دو پلاتين |
BOSCH |
|
122 |
شمع دو پلاتینه 405 |
VALEO |
|
123 |
شمع روغن 206 |
ORGINAL |
|
124 |
صافی بنزین |
PURFLUX |
|
125 |
طبق فرمان 206 تیپ 2 چپ |
FORM PART |
|
126 |
طبق فرمان 206 تیپ 2 راست |
FORM PART |
|
127 |
فشنگی آب 206-کله آبی |
PEUGEOT |
|
128 |
فشنگی آب پژو - سرقهوه ای |
PEUGEOT |
|
129 |
فشنگی حرارتی سر سبز 206 |
PEUGEOT |
|
130 |
فشنگي آب سر قهوه اي 405 |
ORGINAL |
|
131 |
فشنگي استپ ترمز مشكي پژو 206 |
ORGINAL |
|
132 |
فشنگي آب سر سبز 206 |
ORGINAL |
|
133 |
فشنگی دنده عقب 206 |
PEUGEOT |
|
134 |
فشنگی روغن |
PEUGEOT |
|
135 |
فشنگی روغن 206 |
PEUGEOT |
|
136 |
فشنگی هیدرولیک 206 |
PEUGEOT |
|
137 |
فولي سر ميل لنگ آهني 206 |
ORGINAL |
|
138 |
فيلتر اتاق 206 |
PURFLUX |
|
139 |
فیلتر روغن 206 (پایه بلند) |
PURFLUX |
|
140 |
فیلتر روغن 206 (پایه کوتاه) |
PURFLUX |
|
141 |
فیلتر روغن فلزی 405 |
PURFLUX |
|
142 |
فیلتر کولر 206 |
سام خودرو صبا |
|
143 |
فیلتر کولر 405 |
سام خودرو صبا |
|
144 |
فیلتر هوا 206 |
سام خودرو صبا |
|
145 |
فیلتر هوا206 |
PURFLUX |
|
146 |
فیلتر هوای 206 |
FUJI |
|
147 |
فیلتر هوای پارس |
FUJI |
|
148 |
فیلترهوا 405 - پارس - سمند |
سام خودرو صبا |
|
149 |
قرقوری فرمان 206 راست |
FORM PART |
|
150 |
قرقوری فرمان 405 |
FORM PART |
|
151 |
قيفي گيربكس با كاسه نمد پژو 206 |
ORGINAL |
|
152 |
كائوچوبي ته باز كلاچ 206 |
ORGINAL |
|
153 |
كائوچوبي ته باز كلاچ 405 |
ORGINAL |
|
154 |
كائوچوبي ته بسته كلاچ 206 |
ORGINAL |
|
155 |
كائوچوبي ته بسته كلاچ 405 |
ORGINAL |
|
156 |
كائوچوبي كلاچ با خار 206 |
ORGINAL |
|
157 |
كاسه ترمز چرخ عقب 206 |
TRW |
|
158 |
كاسه نمد پلوس كوچك و بزرگ پژو |
ORGINAL |
|
159 |
کاسه نمد باریک ته میل لنگ |
F.K.Z |
|
160 |
کاسه نمد پلوس 405 بزرگ |
ALSTER |
|
161 |
کاسه نمد پلوس 405 کوچک |
ALSTER |
|
162 |
كاسه نمد ژامبون عقب پژو 206 |
ORGINAL |
|
163 |
كاسه نمد ساق سوپاپ پژو 206 |
ORGINAL |
|
164 |
كفشك عقب 206 تيپ 2 |
ROAD HOUSE |
|
165 |
کمپرسور کولر 206 مدل 1449 |
SANDEN |
|
166 |
کمک جلو 405 اورجینال |
PEUGEOT |
|
167 |
كمك جلو 206 چپ |
ORGINAL |
|
168 |
كمك جلو 206 راست |
ORGINAL |
|
169 |
كمك عقب 206 |
ORGINAL |
|
170 |
کمک فنر جلو پیکان |
MONRO |
|
171 |
کمک فنرعقب پیکان |
KYB |
|
172 |
كمك هيدروليك 405 |
ORGINAL |
|
173 |
کوئل 405 انژکتور |
BOSCH |
|
174 |
كائوچويي كلاچ پژو 405 |
ORGINAL |
|
175 |
كيت چكمه اي بغل ياتاقان 405 |
ORGINAL |
|
176 |
كيت ژيگلور سوپاپ آرام كارابراتور 405 |
ORGINAL |
|
177 |
كاسه نمد كوچك ته ميل لنگ پهن |
FKZ |
|
178 |
كاسه نمد كوچك سر ميل لنگ |
FKZ |
|
179 |
گردگير فرمان 405 |
ORGINAL |
|
180 |
لنت ترمز 405 |
VALEO |
|
181 |
لنت ترمز 405 - سمند - پارس |
TEXTAR |
|
182 |
لنت ترمز جلو 206 |
VALEO |
|
183 |
لنت ترمز جلو 206 تیپ 2 |
ROAD HOUSE |
|
184 |
لنت ترمز جلو 405 |
ROAD HOUSE |
|
185 |
لنت ترمز عقب 206 تيپ 2 |
ROAD HOUSE |
|
186 |
لنت ترمز عقب 405 |
BENDIX |
|
187 |
لنت ترمز عقب پارس ، 405 ،ELX |
TRW |
|
188 |
لوازم اگزوز 405 |
ORGINAL |
|
189 |
لوازم چرخ جلو 206 |
ORGINAL |
|
190 |
لولاي كاپوت |
F.K.Z |
|
191 |
مجموعه جلو پنجره 206 |
داخلي |
|
192 |
مجموعه جلو پنجره 405 |
داخلي |
|
193 |
مجموعه جلو پنجره پارس |
داخلي |
|
194 |
مجموعه جلو پنجره سمند |
داخلي |
|
195 |
مجموعه کامل ترمز 206 |
TRW |
|
196 |
مني فولد هوا پژو 206 |
ORGINAL |
|
197 |
موتور تنظیم نور چراغ جلو 206 |
VALEO |
|
198 |
میل تعادل 206 |
FORM PART |
|
199 |
میل تعادل 405 |
FORM PART |
|
200 |
ميل سوپاپ 405 |
ORGINAL |
|
201 |
میل ماهک بلند 206 |
PEUGEOT |
|
202 |
میل ماهک بلند 405 |
PEUGEOT |
|
203 |
میل ماهک كوتاه 405 |
PEUGEOT |
|
204 |
میل ماهک بلند 209 |
PEUGEOT |
|
205 |
ميل موجگير 206 تيپ 2 |
GLOBAL |
|
206 |
واشر سر سيلندر 405 استاندارد |
ميلور |
|
207 |
واشر سر سيلندر استاندارد405 |
ORGINAL |
|
208 |
واشر سر سيلندر استاندارد پژو 405 |
VICTOR REINE |
|
209 |
واشر سر سيلندر 405 تعمير اول |
ميلور |
|
210 |
واشر سر سيلندر 405 تعمير اول |
ORGINAL |
|
211 |
واشر سر سيلندر 405 تعمير دوم |
ORGINAL |
|
212 |
واشر كارتل 405 |
ORGINAL |
|
213 |
واشر كامل پژو 206 |
VICTOR REINE |
|
214 |
واشر كامل پژو 405 سمند و پرشيا |
VICTOR REINE |
|
215 |
واتر پمپ 405 |
BRECAV |
|
216 |
وایر شمع 405 انژکتور |
BOSCH |
|
217 |
یاتاقان ثابت پارس - 1800 |
F.K.Z |
|
218 |
یاتاقان متحرک پارس - 1800 |
F.K.Z |
|
219 |
یخچال |
FRIGOBOX |
|
220 |
یونیت فن 405 اورجینال |
PEUGEOT |
|
تلفن تماس مستقيم : 09113277485 آقاي توسلي | ||
«قرآن و علم»
مقدمه اي با اشاره به اينكه در قرآن كريم بيش از 160 مورد لفظ علم استعمال شده است و انسانها در بيش از 750 مورد از آيات كريمه ي قرآن به تفكر در خلقت آسمانها و زمين و آيات الهي دعوت شده اند. «در زمان نزول قرآن تعداد كل باسوادهاي مكه يا قبيله ي قريش بسيار معدود بودند. ويل دورانت در تاريخ تمدن ج 11 فارسي ص 14 مي گويد: «ظاهرا هيچكس در اين فكر نبود كه وي (رسول اكرم ص) را نوشتن و خواندن آموزد. در آن موقع هنر نوشتن و خواندن از نظر عربها اهميتي نداشت، به همين جهت در قبيله ي قريش بيش از 17 تن خواند و نوشتن را نمي دانستند. معلوم نيست محمد شخصا چيزي نوشته باشد، از بعد از پيامبري كاتب مخصوص داشت. معذلك معروفترين و بليغ ترين كتاب زبان عربي به زبان وي جاري شد و دقايق امور را بهتر از مردم تعليم ديده شناخت».
با اين مقدمه مي پردازيم به برشمردن گوشه اي از آياتي از قرآن كريم كه 1400 سال پيش پرده از رازهائي علمي بر مي دارد كه به مدد گسترش و پيشرفت علم، صرفا برخي از آنها در سده هاي بعد كشف شده اند. از جمله ي اين موارد و آياتي كه آنها را پيشتر بيان كرده اند عبارتند از:
1- قرآن و زوجيت گياهان و نيز زوجيت عمومي كليه ي مخلوقات عالم:
تا كمتر از 300 سال پيش افراد بشر معتقد به اين بودند كه زوجيت خاص انسان و حيوان است تا آنكه «كارل لينه» گياهشناس معروف سوئدي (1787-1707) در سال 1731 نظريه ي خود را مبني بر وجود نر و مادگي در گياهان اعلام كرد اما از سوي ارباب كليسا كه از گفته هاي وي خشمگين شده بودند توقيف شد و كتب وي كه مجموعه ي اكتشافات علمي اش بود نيز بعنوان كتب مضله اعلام و مردم از مطالعه ي آنها منع شدند.
برخي از آيات دال بر زوجيت گياهان:
- «اولم يروا الي الارض كم انبتنا فيها من كل زوج كريم» (سوره شعراء آيه 7)
«آيا به زمين نمي نگرند كه چه مقدار در آن از هر گونه گياهان زوج نيكوئي رويانديم؟»
- «سبحان الذي خلق الازواج كلها مما تنبت الارض و من انفسهم و مما لا يعلمون» (سوره يس آيه 36)
«پاك و منزه است خداوندي كه زوجها را آفريد، از آنچه كه از زمين مي رويند و از خودشان و از آنچه نمي دانند».
- «... و تري الارض هامده فاذا انزلنا عليها المآء اهتزت و ربت و انبتت من كل زوج كريم» (سوره حج آيه 5)
«... و تو زمين را فسرده مي بيني، چون بر آن آب بفرستيم به اهتزاز آيد و نمو كند و از هر گونه گياه بهجت انگيزي زوج بروياند».
- «خلق السموات بغير عمد ترونها و القي في الارض رواسي ان تميدبكم و بث فيها من كل دابه و انزلنا من السماء مآء فانبتنا فيها من كل زوج كريم» (سوره لقمن آيه 10)
«آسمانها را بي هيچ ستوني كه رؤيت كنيد بيافريد و بر روي زمين كوهها را بيافكند تا از لرزش مصون بمانيد و از هر گونه جنبنده اي در آن بپراكند و از آسمان آب فرستاديم و در زمين از هر گونه گياه نيكوئي زوج رويانديم».
- «والارض مددناها و القينا فيها رواسي و انبتنا فيها من كل زوج بهيج» (سوره ق آيه 7)
«و زمين را گسترديم و در آن كوههاي بلند افكنديم و از هر گونه نباتات خوش منظر زوج در آن رويانديم».
- «الذي جعل لكم الارض مهدا و سلك لكم فيها سبلا و انزل من السماء ماء فاخرجنا به ازواجا من نبات شتي» (سوره طه آيه 53)
«كسي كه زمين را مانند گهواره براي شما قرار داد (فرق خواب در گهواره با خواب در زمين در حركت داشتن گهواره است و اين آيه علاوه بر اشاره به زوجيت گياهان اشاره به حركت داشتن زمين نيز مي كند، در عين حال گهواره در عين آنكه حركت دارد اين حركتش آرامش بخش است و موجب ناراحتي نمي شود) و برايتان در آن راههائي پديد آورد و از آسمان آب فرستاد تا بدان انواع گوناگون از گياهان زوج را بروياند».
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آزادي يعني مسؤوليت؛ براي همين است كه بيشتر انسانها از آن وحشت دارند.
جرج برنارد شاو
هر حقي يك مسؤوليت، هر فرصتي يك اجبار و هر مالكيتي يك وظيفه به همراه دارد.
جان د راكلفر
تا زماني كه توده مردم براي بهبود حال يكديگر احساس مسؤوليت نكنند، عدالت اجتماعي تحقق نمييابد. هلن كلر
اگر ميخواهيد فرزندانتان روي پاي خود بايستند، مسؤوليتهايي روي دوش آنها بگذاريد.
ابيگيل فون بورن
نميتوانيد به ساختن دنياي بهتر اميد داشته باشيد؛ مگر آنكه تكتك افراد اجتماع پيشرفت كنند. به اين منظور هر يك از ما بايد علاوه بر اينكه به پيشرفت خود ميانديشد، در برابر عموم افراد بشر نيز احساس مسؤوليت كند. وظيفة ما اين است كه براي كساني كه ميتوانيم، مفيد واقع شويم. ماري كوري
دوستي همواره يك مسؤوليت شيرين است نه يك فرصت. خليل جيبران
بياييد نه تنها براي خود و خانوادهمان بلكه براي كشورمان مسؤوليت بيشتري بپذيريم.
بيل كلينتون
آنان كه نميتوانند مسؤوليت قبول كنند، به رهبر نياز دارند و براي داشتن رهبر داد و هوار راه مياندازند. هرمان هسه
مرد پر جربزه و قابل وقتي با بحران روبهرو ميشود، به تكيهگاه فكر نميكند؛ روش خود را تحميل ميكند، مسؤوليتش را ميپذيرد و نتيجه كار را [پيروزي يا شكست] از آن خود ميداند. چارلز دوگل
به ما انسانها حق انتخاب دادهاند پس نميتوانيم مسؤوليتها را به گردن خدا يا طبيعت بيندازيم. مسؤوليت خود ماست و بايد خودمان به دوش بكشيم. آرنولد توينبي
زندگي يك هديه است: به ما حق ويژه، فرصت و مسؤوليت ميدهد؛ بايد به ازاي آن، چيزي بازگردانيم و آن «خودِ اصلاحشده» ماست. توني رابنيز
بيشتر مردم به آزادي علاقه چنداني ندارند چون آزادي مستلزم و متضمن مسؤوليت است و بيشتر مردم از مسؤوليت واهمه دارند. زيگموند فرويد
در تئوري اگر به انسان در برابر اعمالش مسؤوليت بدهيد، در آن صورت حق انتخاب دارد كه قبول كند يا نكند. ديويد گاور
من آمدهام كه مسؤوليت كارهايي را كه كردهام بر عهده بگيرم. من مسؤوليت كاري را كه نكردهام، نميپذيرم. اليور نورث
مسؤوليت دوش به دوش قدرت و لياقت [ظرفيت] حركت ميكند. جوسيا گيلبرت هولاند
مردم از هيچ چيز به اندازه مسؤوليت وحشت ندارند؛ با وجود اين هيچ چيز به اندازه مسووليت در دنيا باعث پيشرفت انسان نميشود. فرانك كرين
آيا هيچ وقت احساس رنج و آزار كردهايد. كه بعد از آن رنج و آزار بيشتر از آنچه به شما وارد شده ببينيد؟ آنگاه مي بينيدكه به شما رنج آزاري نرسيده، بلكه اين خدا بوده كه مورد رنج و آزار قرار داشته است. وقتي به شما رنج و آزاري ميرسد، بايد خودتان را فراموش كنيد و به موقعيت خدا فكر كنيد. آنگاه ميبينيد كه خدا آنجاست. خدا قبلاً آنجاست تا شما را تسكين دهد. تاكنون اين تمايل انسان به پيروي از خدا و گذاشتن تمام آزمايشات و مشكلات براي خدا بوده است. وقتي انسان دعا ميكند، تقاضا ميكند، خواهش ميكنم مرا با سختيها روبرو نكن. ما بايد مسير دعاي خود را تا ۱۸۰ درجه تغيير دهيم.
هر جا بدبختي و رنج است خدا همآنجاست. وقتي بيعدالتي اي نسبت به شخصي ميبينيد، در خودتان خشم بخصوصي احساس ميكنيد، اين چيزي است كه در فكر خدا وجود دارد.
نه جانی و نه غیر از جان چه چیزی نه در جان نه برون از جان کجایی
ز پیدایی خود پنهان بماندی چنین پیدا چنین پنهان کجایی
هزاران درد دارم لیک بی تو ندارد درد من درمان کجایی
چو تو حیران خود را دست گیری ز پا افتادهام حیران کجایی
ز بس کز عشق تو در خون بگشتم نه کفرم ماند و نه ایمان کجایی
بیا تا در غم خویشم ببینی چو گویی در خم چوگان کجایی
ز شوق آفتاب طلعت تو شدم چون ذره سرگردان کجایی
شد از طوفان چشمم غرقه کشتی ندانم تا درین طوفان کجایی
چنان دلتنگ شد عطار بی تو که شد بر وی جهان زندان کجایی
شاهد افلاکی
چون زلف توام جانا در عین پریشانی چون باد سحرگاهم در بی سر و سامانی
من خاکم و من گردم، من اشکم و من دردم تو مهری و تو نوری، تو عشقی و تو جانی
خواهم که ترا در بر بنشانم و بنشینم تا آتش جانم را بنشینی و بنشانی
ای شاهد افلاکی در مست و در پاکی من چشم ترا مانم تو اشک مرا مانی
در سینهی سوزانم مستوری و مهجوری در دیدهی بیدارم پیدایی و پنهانی
من زمزمهی عودم، تو زمزمه پردازی من سلسلهی موجم، تو سلسله جبنانی
از آتش سودایت دارم من و دارد دل دلقی که نمی بینی دردی که نمی دانی
دل با من و جان بی تو، نسپاری و بسپارم کام از تو و تاب از من، نستانم و بستانی
ای چشم رهی سویت، کو چشم رهی جویه ؟ روی از من سرگردان شاید که نگردانی
كليله و دمنه
شنودم مثل ملوک در آنچه ميان ايشان و خدم تازه گردد از خلاف و خيانت و جفا و عقوبت ، و مراجعت بتجديد اعتماد ؛ که بر ملوک لازم است برای نظام ممالک و رعايت مصالح بر مقتضای اين سخن رفتن که الرجوع الی الحق اولی من التمادی فی الباطل . اکنون بيان کند از جهت من داستان آن کس که برای صيانت نفس و رعايت مصالح خويش از ايذای ديگران و رسانيدن مضرت بجانوران باز باشد ، و پند خردمندان را در گوش گذارد تا بامثال آن در نماند.برهمن جواب داد که :بر تعذيب حيوان اقدام روا ندارند مگر جاهلان که ميان خير و شر و نفع و ضر فرق نتوانند کرد ، و بحکم حمق خويش از عواقب اعمال غافل باشند ، و نظر بصيرت ايشان بخواتم کارها کم تواند رسيد ، که علم اصحاب ضلالت از ادراک مصالح بر اطلاق قاصر است و حجاب جهل ، احراز سعادت را مانعی ظاهر .و خردمند هرچه برخود نپسندد در باب همچو خودی چگونه روا دارد ؟ قال النبی صلی الله عليه : کيف تبصر القذاة فی عين اخيک و لاتبصر الجذل فی عينک ؟
بد می کنی و نيک طمع می داری ؟ هم بد باشد سزای بدکردای!
و ببايد دانست که هر کرداری پاداشی است که هراينه بارباب آن برسد و بتاخيری که در ميان افتد مغرور نشايد بود ، که آنچه آمد نيست نزديک باشد اگرچه مدت گيرد . اگر کسی خواهد که بدکرداری خود را بتمويه و تلبيس پوشيده گرداند و به زرق و شعوذه خود را در لباس نيکوکاری جلوه دهد چنانکه مردمان بر وی ثنا گويند و بدورو نزديک ذکر آن ساير شود ، بدين وسيلت هرگز نتايج افعال ناپسنديده از وی مصروف نگردد و ثمره آن خبث باطن هرچه مهنا تر بيابد ؛ آنگاه پند پذيرد و باخلاق ستوده گرايد . و نظير اين نشانه افسانه شير است و آن مرد تيرانداز . رای پرسيد که :
چگونه است آن؟ گفت :
آورده اند که شيری ماده با دو بچه در بيشه ای وطن داشت .
روزی بطلب صيد از بيشه بيرون رفت تيراندازی بيامد و هردو بچه او را بکشت و پوست بکشيد . چون شير بازآمد و بچگان را از آن گونه بر زمين افگنده ديد فرياد و نفير بآسمان رسانيد . و در همسايگی او شگالی پير بود ، چون آواز او بشنود بنزديک او رفت و گفت : موجب ضجرت چيست ؟ شير صورت حال باز راند و بچگان را بدو نمود .
شگال گفت :بدان که هر ابتدايی را انتهايی است ، و هر گاه که مدت عمر سپری شد و هنگام اجل فراز رسيد لحظتی مهلت صورت نبندد ، فاذا جاء اجلهم لايستاخرون ساعة و لايستقدمون . و نيز بنای کارهای اين عالم فانی برين نهاده شده ست ،بر اثر هر شادی غمی چشم می بايد داشت ، و بر اثر هر غم شاديی توقع می بايد کرد ، و در همه احوال بقضای آسمانی راضی می بود که پيرايه مردان در حوادث صبر است .
تا بود چنين بده ست کار عالم شادی پس اندهست و راحت پس غم
جزع در توقف دار و انصاف از نفس خود بده ، و ما اصابک من سيئة فمن نفسک . و در امثال آمده ست که «يداک او کتا وفوک نفخ.» آنچه تيرانداز با تو کرده ست اضعاف آن از جهت تو بر ديگران رفته است ، و ايشان همين جزع در ميان آورده اند و اضطراب بيهوده کرده و باز بضرورت صبور گشته . بر رنج ديگران صبرکن چنان که بر رنج تو صبر کردند ، و نشنوده ای «کما تدين تدان؟» هرچه کرده شود مکافات آن از نيکی و بدی براندازه کردار خويش چشم می بايد داشت ، چه هرکه تخمی پراگند ريع آن بی شک بردارد . واگر همين سيرت را ملازم خواهی بود از اينها بسی می بايد ديد ؛ اخلاق خود را برفق و کم آزاری آراسته گردان و خلق را مترسان تا ايمن توانی زيست .
شير گفت :اين سخن را بی محاباتر بران ، و ببراهين و حجتها موکد گردان ، گفت :عمر تو چند است ؟ گفت :صد سال.گفت :دراين مدت قوت تو از چه بوده است ؟ گفت : از گوشت جانوران - وحوش و مردم - که شکار کردمی . گفت :پس آن جانوران که چندين سال بگوش ايشان غدا می يافتی مادر و پدر نداشتند و عزيزان ايشان را سوز مفارقت در قلق و جزع نياورد ؟ اگر آن روز عاقبت آن کار بديده بودی و از خون ريختن تحرز نموده ، بهيچ حال اين پيش نيامدی .
چون شير اين سخن بشنود حقيقت آن بشناخت و متيقن گشت که آن ناکامی او را از خودکامی بروی آمده ست . بترک ناشايست بگفت و از خوردن گوشت باز بود وبميوها قانع گشت . و راست گفته اند :
ذوالجهل يفعل ماذوالعقل فاعله فی النائبات ولکن بعد ما افتضحا
چون شگال اقبال شير بر ميوه که قوت او بود بديد رنجور شد واو را گفت :
آسان روزی خود گرفتی و از قوت ديگران که ترا دران ناقه و جملی نيست خوردن گرفتی ! درخت خود بقوت تو وفا نکند ، و اين درخت و ميوه و کسانی که قوت ايشان بدان تعلق دارد سخت زود هلاک شوند ، چه ارزاق ايشان فرا خصمی بزرگ و شريکی عظيم افتاد . اثر ظلم تو در جانها ظاهر می گشت ، امروز نتيجه زهد تو در نانها ظاهر می گردد. در هر دو حالت ، عالميان را از جور تو خلاص ممکن نيست ، خواهی در معرض تهور و فساد باش ، خواه در لباس عفت و صلاح !
گر توی پس مکش زما رگ و پی ور خدايست شرم دار از وی
چون شير اين فصل بشنود از خوردن ميوه اعراض کرد و روزگار در عبادت مستغرق گردانيد و با خود انديشيد :
چند از اين باد خاک و آتش و آب وز دی و تير وز تموز و بهار؟
بس که نامرد و خشک مغزت کرد رنگ کافور و مشک ليل و نهار!
برگذر زين سرای غرچه فريب درگذر زين رباط مردم خوار!
اينست داستان متهور بدکردار که جهانيان را مسخر عذاب خود دارد و از وخامت عواقب آن نينديشد تا بمانند آن مبتلا گردد ، آنگاه وجه صواب و طريق رشاد اندران بشناسد ، چنانکه شير دل از خون خوردن و خون ريختن بر نداشت تا هر دو جگر گوشه خود را بيک صفقه بر روی زمين پوست باز کرده نديد ، و چون اين تجربت حاصل آمد از اين عالم غدار اعراض نمود و بيش بنمايش بی اصل او التفات جايز نشمرد و گفت :
هرانک او در تو دل بندد همی بر خويشتن خندد که جز همچون تو نااهلی چو تو دلدار نپسندد
اگر نو کيسه عشقی را بدست آری تو ، از شوخی قباها کز تو بردوزد کمرها کز تو بربندد !
و گر خود تو نه ای ، جانی ، چنان بستانم از تو دل که يک چشمت همی گريد دگر چشمت همی خندد
و خردمندان سزاوارند بدانچه اين اشارت را در فهم آرند و اين تجارت را مقتدای عقل و طبع گردانند ، و بنای کارهای دينی و دنياوی بر قضيت آن نهند ، و هرچه خود را و فرزندان خود را نپسندند در باب ديگران روا ندارند ، تا فواتح و خواتم کارهای ايشان بنام نيکو و ذکر باقی متحلی باشد ، و در دنيا و آخرت از تبعات بدکرداری مسلم ماند .
والله يهدی من يشاء الی صراط مستقيم للذين احسنوا الحسنی وزيادة
باب ششم : در ناتوانى و پيرى
حکايت
با طايفه دانشمندان در جامع دمشق بحثی همی کردم که جوانی درآمد و گفت : درين ميان کسی هست که زبان پارسی بداند ؟ غالب اشارت به من کردند . گفتمش : خير است . گفت : پيری صد و پنجاه ساله در حالت نزع است و به زبان عجم چيزی همی گويد و مفهوم ما نمی گردد ، گر بکرم رنجه شوی مزد يايی ، باشد که وصيتی همی کند . چون به بالينش فراز شدم اين می گفت :
دمى چند گفتم بر آرم به كام دريغا كه بگرفت راه نفس
دريغا كه بر خوان الوان عمر دمى خورده بوديم و گفتند: بس
معانی اين سخن را به عربی با شاميان همی فتم و تعجب همی کردند از عمر دراز و تاسف او همچنان بر حيات دنيا . گفتم : چگونه ای درين حالت ؟ گفت : چه گويم ؟
نديده اى كه چه سختى همى رسد به كسى كه از دهانش به در مى كنند دندانى ؟
اينك مقايسه كن كه در اين حال ، بر من چه مى گذرد؟
قياس كن كه چه حالت بود در آن ساعت
كه از وجود عزيزش بدر رود جانى
گفتم : تصور مرگ از خيال خود بدر کن و وهم را بر طبيعت مستولی مگردان که فيلسوفان يونان گفته اند : مزاج ار چه مستقيم بود ، اعتماد بقا را نشايد و مرض گرچه هايل ، دلالت کلی بر هلاک نکند ، اگر فرمايی طبيبی را بخوانم تا معالجت کند . ديده برکرد و بخنديد و گفت :
دست بر هم زند طبيب ظريف چون حرف بيند اوفتاده حريف
خواجه در بند نقش ايوان است خانه از پاى بند ويران است
پيرمردى ز نزع مى ناليد پيرزن صندلش همى ماليد
چون مخبط شد اعتدال مزاج نه عزيمت اثر كند نه علاج
* * * *
حکايت
پيرمردی حکايت کند که دختری خواسته بود و حجره به گل آراسته و به خلوت با او نشسته و ديده وو دل در او بسته و شبهای دراز نخفتی و بذله ها ولطيفه ها گفتی ، باشد که موانست پذيرد و وحشت نگيرد . از جمله می گفتم : بخت بلندت يار بود و چشم بخت بيدار که به صحبت پيری افتادی پخته ،پرورده ، جهانديده ، آرميده ، گرم و سرد چشيده ، نيک و بد آزموده که حق صحبت می داند و شرط مودت بجای آورد ، مشفق و مهربان ، خوش طبع و شيرين زبان .
تا توانم دلت به دست آرم ور بيازاريم نيازارم
ور چو طوطى ، شكر بود خورشت جان شيرين فداى پرورشت
نه گرفتار آمدی به دست جوانی معجب ، خيره رای سرتيز ، سبک پای که هر دم هوسی پزد و هر لحظه رايی زند و هر شب جايی خسبد و هر روز ياری گيرد .
وفادارى مدار از بلبلان ، چشم كه هر دم بر گلى ديگر سرايند
خلاف پيران که به عقل و ادب زندگانی کنند نه بمقتضای جهل جوانی.
ز خود بهترى جوى و فرصت شمار كه با چون خودى گم كنى روزگار
گفت : چندين برين نمط بگفتم که گمان بردم که دلش برقيد من آمد و صيد من شد . ناگه نفسی سرد از سر درد برآورد و گفت : چندين سخن که بگفتی در ترازوی عقل من وزن آن سخن ندارد که وقتی شنيدم از قابله خويش که گفت : زن جوان را اگر تيری در پهلو نشيند ، به که پيری .
زن كز بر مرد، بى رضا برخيزد بس فتنه و جنگ از آن سرا برخيزد
فی الجمله امکان موفقت نبود و به مفارقت انجاميد . چون مدت عدت برآمد نکاحش بستند با جوانی تند و ترشروی ، تهيدست ، بدخوی ، جور و جفا می ديد و رنج و عنا می کشيد و شکر نعمت حق همچنان می گفت که الحمدلله که ازان عذاب برهيدم و بدين نعيم مقيم برسيدم .
با اين همه جور و تندخويى بارت بكشم كه خوبرويى
با تو مرا سوختن اندر عذاب به كه شدن با دگرى در بهشت
بوى پياز از دهن خوبروى نغز برآيد كه گل از دست زشت
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چند سوزیم من و شمع
چند سوزیم من و شمع شبستان همه شب چند سازیم چنین بی سر و سامان همه شب
تا به شب بر سر بازار معلق همه روز تا دم صبح سرافکنده و گریان همه شب
سوختم ز آتش هجران و دلم بریان شد ور نسازم چکنم با دل بریان همه شب
رشتهی جان من سوخته بگسیخته باد گر ز عشق سر زلفت ندهم جان همه شب
هر شبی کز خم گیسوی توام یاد آید در خیالم گذرد خواب پریشان همه شب
تا تودر چشم منی از نظرم دور نشد ذرهئی چشمه خورشید درخشان همه شب
خبرت هست که در بادیهی هجر تو نیست تکیه گاهم بجز از خار مغیلان همه شب
بخیال رخ و زلف تو بود تا دم صبح بستر خواب من از لاله و ریحان همه شب
در هوای گل روی تو بود خواجو را همنفس بلبل شب خیز خوش الحان همه شب
سر آن دارم کامروز بر یار شوم بر آن دلبر دردیکش عیار شوم
به خرابات و می و مصطبه ایمان آرم وز مناجات شب و صومعه بیزار شوم
چون که شایسته سجاده و تسبیح نیم باشد ای دوست که شایستهی زنار شوم
کار میدارد و معشوق و خرابات و قمار کی بود کی که دگر بر سر انکار شوم
خورد بر عیش خوشم توبه فراوان زنهار ببر می همی از توبه به زنهار شوم
تو اگر معتکف توبه همی باشی باش من همی معتکف خانهی خمار شوم
رو تو و قامت موذن که مرا زین مستی تا قیامت سر آن نیست که هشیار شوم
چه گویی
چه گویی با تو درگیرد که از بندی برون آیم غمی با تو فرو گویم دمی با تو برآسایم
ندارم جای آن لیکن چو تو با من سخن گویی من بیچاره پندارم که از جایی همی آیم
مرا گویی کزین آخر چه میجویی چه میجویم کمر تا از توبربندم فقع تا از تو بگشایم
گر بوسهای خواهم بده چون دل گرو داری مترس ارچه تهیدستم ولیکن پای برجایم
اگر دستی نهم بر تو نهادم دست بر ملکی وگرنه بیتو تنگ آید همه آفاق در پایم
فراقت هر زمان گوید که بگریز انوری رستی اگر می راستی خواهی چو هندو نیست پروایم
درياب که از دست تو هم در گذرد
موش بتگ ايستاد و بنزديک آهو آمد و گفت :ای برادر مشفق ,چگونه در اين ورطه افتادی با چندان خرد و کياست و ذکا و فطنت ؟جواب داد که :در مقابله تقدير آسمانی .که نه آن را توان ديد و نه بحيلت هنگام آن را در توان يافت ,زيرکی چه سود دارد ؟دراين ميانه باخه برسيد ,آهو را گفت :که ای بذاذر ,آمدن تو اينجا بر من دشوارتر از اين واقعه است , که اگر صياد بما رسد و موش بندهای من بريده باشد بتنگ با او مسابقت توانم کردن ,و زاغ بپرد ,و موش در سوراخ گريزد ,و تو نه پای گريز داری و نه دست مقاومت ,اين تجشم چرا نمودی ؟باخه گفت :چگونه نيامدمی و بچه تاويل توقف روا داشتمی ,و از آن زندگانی که در فراق دوستان گذرد چه لذت توان يافت ؟و کدام خردمند آن را وزنی نهاده ست و از عمر شمرده ؟ويکی از معونت بر خرسندی و آرامش نفس در نوايب ديدار برادران است و مفاوضت ايشان در آنچه بصبر و تسلی پيوندد و فراغ و رهايش را متضمن باشد ,که چون کسی در سخن هجر افتاد حريم دل او غم را مباح گردد و بصر و بصيرت نقصان پذيرد و رای و رويت بی منفعت ماند .و در جمله متفکر مباش,که همين ساعت خلاص يابی و اين عقده گشاده شود .ودر همه احوال شکر واجب است ,که اگر زخمی رسيدی و بجان گزندی بودی تدارک آن در ميدان وهم نگنجيدی ,و تلافی آن در نگارخانه هوش متصور ننمودی
لاتبل بالخطوب مادمت حيا کل خطب سوی المنيه سهل
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الهى ناتوانم و در راهم و گردنههاى سخت در پيش است و رهزنهاى بسيار در كمين و بار گران بر دوش يا هادى اهدنا الصراط المستقيم صراط الذين انعمت عليهم غير المغضوب عليهم و لا الضالين.
الهى از روى آفتاب و ماه و ستارگان شرمندهام از انس و جان شرمندهام حتى از روى شيطان شرمندهام كه همه در كار خود استوارند و اين سست عهد ناپايدار.
الهى رجب بگذشت و ما از خود نگذشتيم و تو از ما بگذر.
الهى عاقبت چه خواهد شد و با ابد چه بايد كرد.
الهى عارفان گويند عرفنى نفسك، اين جاهل گويد عرفنى نفسى.
الهى اهل ادب گويند به صدرم تصرفى بفرما اين بى ادب گويد بر بطنم دست تصرفى نه.
كاشف الغطا
ولادت
شيخ محمد حسن كاشف الغطا در سال 1294 ق. در محله عماره نجف ديده به جهان گشود. (279) جد او آيت الله شيخ جعفر كاشف الغطا (متوفى 1228 ق.) سرشناس ترين و پرآوازه ترين فرد اين خاندان است و فرزندان و نوادگان وى از دانشمندان و مجتهدان بزرگ عراق بودند. آيت الله شيخ على كاشف الغطا (متوفاى 1320 ق.) - پدر قهرمان اين دفتر- از مراجع بلند پايه تقليد عراق بود.(280)
سالهاى سبز
محمد حسين در ده سالگى وارد حوزه علميه نجف شد. ادبيات عرب، حساب، نجوم، فقه و اصول را با پشتكار و شوق فراوان فرا گرفت. عطش يادگيرى او را بى قرار كرده بود. نوجوان بود و آرزومند فراگيرى علوم بيشتر. محمد حسين در كنار تحصيل علوم حوزوى به مطالعه عميق در ادبيات عرب پرداخت. ذوق ادبى خوبى داشت. نثر و نظم زيباى نوشته ها و سروده هاى او از ابتداى نوجوانى، هويداى روح لطيف و مهربانش بود. محمد حسين از ابتداى نوجوانى به سرودن شعر و نويسندگى پرداخت. پانزده ساله بود كه كتاب "العبقات العنبريه ..." را درباره خاندان خود نوشت. هنوز هيجده بهار بيش نديده بود كه دروس سطح حوزه را به پايان برد و به درس خارج فقه و اصول آيت الله سيد محمد كاظم يزدى و آيت الله آخوند خراسانى راه يافت. روح ناآرامى داشت. ادبيات عرب و تاريخ نتوانست عطش ذهنش را فرو نشاند. به اميد اينكه گمشده اش را در اشعار شاعران و تاريخ خاندانش بيايد، سالها در وادى شعر و ادب و تاريخ گام نهاد. اما باز تشنه بود. شگفت كه خود نمى دانست تشنه چيست! به سراغ بركه حكمت و فلسفه رفت تا روح تشنه اش را سيراب نمايد. وى در اين باره مى گويد: تمام كتابهاى صدر المتاءلهين، ملاصدرا شيرازى - از مشاعر، عرشيه و شرح هدايه گرفته تا اسفار و شرح اصول كافى- را نزد استادان برجسته آموختم ....
زمانى نيز به يادگيرى علم حديث، تفسير و عرفان پرداخت تا بتواند اندكى از عطش خود بكاهد. به كتابهاى فصوص، نصوص، فكوك و ديوان اشعار مولوى، جامى و ... پناه برد.
سالها نزد استادان برجسته حوزه علميه نجف مانند آيات بزرگوار مصطفى تبريزى، ميرزا محمد باقر اصطهباناتى، احمد شيرازى، على محمد نجف آبادى، ملا على اصغر مازندرانى، حاج آقا رضا همدانى، محمد تقى شيرازى و علامه حسين نورى (محدث نورى) به شاگردى پرداخت.(281)
در اين ميان، كاشف الغطا علاقه وافرى به محدث نورى داشت. محدث نورى از كارشناسان سرشناس علم حديث بود. كاشف الغطا همواره با استاد، نشست و برخاست داشت. از پندهاى استاد براى سير و سلوك و پيمودن راههاى سعادت بهره مى جست.
روزى به استاد گفت: رطوبت جوانى در جان من رسوخ كرده و مرا از برخاستن براى نماز شب سنگين نموده است. از اين رو، در برخى از شبها، نماز شب از دستم مى رود. استاد فرياد برآورد: چرا؟ چرا؟ برخيز! برخيز! كاشف الغطا سالها پس از رحلت استاد، از آن سرزنش استاد ياد مى كند مى گويد: صداى استاد مرحومم، در هر شب، پيش از سحر مرا براى نماز شب بيدار مى كند.(282)
كاشف الغطا چند دوره در درس خارج فقه و اصول آيت الله سيد محمد كاظم يزدى و آيت الله آخوند خراسانى شركت كرد (283) تا توانست قله اجتهاد را فتح نمايد.
وى شرحى بر كتاب "العروة الوثقى" نوشته آيت الله سيد محمد كاظم يزدى نگاشت كه احتمالاً نخستين شرحى است كه بر اين تاب نوشته شده باشد، اين شرح چهار جلد است.(284)
آيت الله كاشف الغطا پس از سالها تحصيل و رسيدن به مقام اجتهاد، به تدريس آموخته هايش براى طلاب جوان پرداخت. دهها طلبه در مسجد هندى و مقبره ميرزاى شيرازى در صحن حرم حضرت على عليه السلام گرد مى آمدند و در درس او شركت مى جستند.
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ساقیا می ده که جز می نشکند پرهیز را تا زمانی کم کنم این زهد رنگ آمیز را
ملکت آل بنی آدم ندارد قیمتی خاک ره باید شمردن دولت پرویز را
دین زردشتی و آیین قلندر چند چند توشه باید ساختن مر راه جان آویز را
هر چه اسبابست آتش در زن و خرم نشین بدرهی ناداشتی به روز رستاخیز را
زاهدان و مصلحان مر نزهت فردوس را وین گروه لاابالی جان عشقانگیز را
ساقیا زنجیر مشکین را ز مه بردار زود بر رخ زردم نه آن یاقوت شکر ریز را
باب پنجم : در عشق و جوانى
حکايت
حسن ميمندی را گفتند سلطان محمود چندين بنده صاحب جمال دارد که هر يکی بديع جهانی اند ، چگونه افتاده است که با هيچ يک از ايشان ميل و محبتی ندارد چنانکه با اياز که حسنی زيادتی ندارد ؟ گفت : هر چه به دل فرو آيد در ديده نکو نمايد .
هر كه سلطان مريد او باشد گر همه بد كند، نكو باشد
وآنكه را پادشه بيندازد كسش از خيل خانه ننوازد327
كسى به ديده انكار گر نگاه كند نشان صورت يوسف دهد به ناخوبى
و گر به چشم ارادت نگه كنى در ديو فرشته ايت نمايد به چشم كروبى
* * * *
حکايت
گويند خواجه ای را بنده ای نادرالحسن بود و با وی سبيل مودت و ديانت نظری داشت . بايکی از دوستان گفت : دريغ اين بنده با حسن و شمايلی که دارد اگر زبان درازی و بی ادبی نکردی. گفت : برادر ، چو اقرار دوستی کردی توقع خدمت مدار که چون عاشق و معشوقی در ميان آمد مالک و مملوک برخاست .
خواجه با بنده پرى رخسار چون درآمد به بازى و خنده
نه عجب كو چو خواجه حكم كند وين كشد بار ناز چون بنده
* * * *
حکايت
پارسايى را ديدم به محبت شخصی گرفتار ، نه طاقت صبر و نه يارای گفتار. چندانکه ملامت ديدی و غرامت کشيدی ترک تصابی نگفتی و گفتی :
كوته نكنم ز دامنت دست ور خود بزنى به تيغ تيزم
بعد از تو ملاذ و ملجاءيى نيست هم در تو گريزم ، ار گريزم
باری ملامتش کردم و گفتم : عقل نفيست را چه شد تا نفس خسيس غالب آمد ؟ زمانی بفکرت فرو رفت و گفت ک
هر كجا سلطان عشق آمد، نماند قوت بازوى تقوا را محل
پاكدامن چون زيد بيچاره اى اوفتاده تا گريبان در وحل
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نور رخ تو
نور رخ تو قمر ندارد شیرینی تو شکر ندارد
خوش باد عشق خوبرویی کز خوبی او خبر ندارد
دارندهی شرق و غرب سلطان والله که چو تو دگر ندارد
رضوان بهشت حق یقینم چون تو به سزا پسر ندارد
خوبی که بدو رسید بتوان باغی باشد که در ندارد
با زر بزید به کام عاشق پس چون کند آنکه زر ندارد
بی وصل تو بود عاشقانت چون شخص بود که سر ندارد
رو خوبی کن چنانکه خوبی کاین خوبی دیر بر ندارد
هر چند نصیحت سنایی نزد تو بسی خطر ندارد
ازدواج موقت
نويسنده: شهيد مرتضى مطهري
عناوين:
3- جوان امروز و دوره بلوغ و بحران جنسي
4- رهبانيِِِِِت موقت ، كمونيسم جنسي يا ازدواج موقت؟؟
7- معايب و مفاسد نكاح منقطع ومسئله تعدد زوجات
8- سرنوشت فرزندان در ازدواج موقت
11- آيا تشريع ازدواج موقت ، براي تامين هوسراني است؟
ادامه مطلب>>>
درد ما را در جهان درمان مبادا بیشما مرگ بادا بیشما و جان مبادا بیشما
سینههای عاشقان جز از شما روشن مباد گلبن جانهای ما خندان مبادا بیشما
بشنو از ایمان که میگوید به آواز بلند با دو زلف کافرت کایمان مبادا بیشما
عقل سلطان نهان و آسمان چون چتر او تاج و تخت و چتر این سلطان مبادا بیشما
عشق را دیدم میان عاشقان ساقی شده جان ما را دیدن ایشان مبادا بیشما
جانهای مرده را ای چون دم عیسی شما ملک مصر و یوسف کنعان مبادا بیشما
چون به نقد عشق شمس الدین تبریزی خوشم رخ چو زر کردم بگفتم کان مبادا بیشما
بسم الله الرحمن الرحيم
الهى بحق خودت حضورم ده و از جمال آفتاب آفرينت نورم ده.
الهى راز دل را نهفتن دشوار است و گفتن دشوارتر.
الهى يا من يعفو عن الكثير و يعطى الكثير بالقليل از زحمت كثرتم وارهان و رحمت وحدتم ده.
الهى ساليانى مىپنداشتم كه ما حافظ دين توايم استغفرك اللهم در اين ليلة الرغائب هزار و سيصد و نود فهميدم كه دين تو حافظ ما است احمدك اللهم.
الهى چگونه خاموش باشم كه دل در جوش و خروش است و چگونه سخن گويم كه خرد مدهوش و بيهوش است.
الهى ما همه بيچارهايم و تنها تو چارهاى و ما همه هيچكارهايم و تنها تو كارهاى.
الهى از پاى تا فرقم در نور تو غرقم يا نور السموات و الارض انعمت فزد.
الهى شان اين كلمه كوچك كه به اين علو و عظمت است پس يا على يا عظيم شان متكلم اينهمه كلمات شگفت لا تتناهى چون خواهد بود.
الهى واى بر من اگر دانشم رهزنم شود و كتابم حجابم.
الهى چون تو حاضرى چه جويم و چون تو ناظرى چه گويم.
الهى چگونه گويم نشناختمت كه شناختمت و چگونه گويم شناختمت كه نشناختمت.
الهى چون عوامل طاحونه چشم بسته و تن خستهام راه بسيار ميروم و مسافتى نمىپيمايم واى من اگر دستم نگيرى و رهاييم ندهى.
الهى خودت آگاهى كه درياى دلم را جزر و مد استيا باسط بسطم ده و يا قابض قبضم كن.
الهى دستبا ادب دراز است و پاى بى ادب، يا باسط اليدين بالرحمة خذ بيدى.
الهى بسيار كسانى دعوى بندگى كردهاند و دم از ترك دنيا زدهاند، تا دنيا بديشان روى آورد جز وى همه را پشت پا زدهاند اين بنده در معرض امتحان درنيامده شرمسار استبحق خودت ثبت قلبى على دينك.
الهى ناتوانم و در راهم و گردنههاى سخت در پيش است و رهزنهاى بسيار در كمين و بار گران بر دوش يا هادى اهدنا الصراط المستقيم صراط الذين انعمت عليهم غير المغضوب عليهم و لا الضالين.
ولادت
آيت الله حاج شيخ كاظم شيرازي در سال 1290 ه.ق، در شيراز زاده شد {موسوي كاظمي، احسن الوديعه، ج2، 131؛ انصاري قمي، ديوان اشعار، 264}. برخي هم سال ولادتش را مردد بين 1290 و 1292 ه.ق نگاشته اند {مشار، مؤلفين كتب چاپي، ج5، 24}. پدرش، حاج حيدر، از تجار شيراز بود و به تقوا و پرهيزگاري شهرت داشت {ركن زاده، دانشمندان و سخنسرايان فارس، ج4 ، 232}.
تحصيلات
وي دوران كودكي اش را در زادگاهش به فراگيري خواندن و نوشتن گذرانيد. سپس در سال 1300 ه.ق همراه با پدر و مادرش به قصد زيارت عتبات عاليات، رهسپار نجف و كربلا شد. وي در كربلا با والدينش اقامت گزيد و ادبيات عرب را به خوبي فرا گرفت. پس از دو سال، پدر و مادرش به شيراز بازگشتند. او به تنهايي به تحصيل ادامه داد تا پس از چهار سال، به شيراز مهاجرت كرد. وي مطول و معالم را نزد عالم كامل حاج سيد محمد علي كازروني ـ كه در تدريس بسيار ماهر بود ـ فرا گرفت.
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اديبي فاضل، با كمال و استادي يگانه
سحرگاه شب چهارشنبه 13 دي ماه 1278 شمسي، در محله هاي جنوب شرقي اصفهان، كودكي به دنيا آمد كه او را جلال الدين ناميدند. در اين خانه اتاقي بود مزين به نقاشي و آينه كاري، كه خط خوش پدر و پدر بزرگ جلال الدين، زينت بخش آينه كاريهاي آنجا بود. بالاي اتاق و زير آينه ها و دسته گل نقاشي، حديث نبوي "انا مدينة العلم و علي بابها" كتابت شده بود و رو به روي آن در پايين گلدان، آينه كاري بسيار زيبايي است و اين بيت از مولانا نوشته شده بود:
از علي (ع) آموز اخلاص عمل شير حق را دان منزه از دغل
محل تولد جلال الدين، در همين اتاق بوده است. او از 5 سالگي درس خواندن را آغاز كرد. در اين سن اندك، پدر و مادر، او را تشويق مي كردند. درسي را كه پدر مي داد، مادر براي فراگيري بيشتر تكرار مي كرد. جلال الدين نزد مادر، خواندن قرآن، گلستان و غزليات حافظ را فرا گرفت. مادر از كوچكترين فرصتي براي آموزش فرزندش استفاده مي كرد. او آموزشهاي مقدماتي را در منزل به فرزندش آموخت و پس از آن، جلال الدين به مكتب خانه رفت. در مكتب خانه، نزد بانويي پرهيزگار به نام ملا باجي به مطالعه اصول و فروع دين و عم جزء پرداخت. ملا باجي، زني عابد و صالح و خداپرست بود كه نبات بيگم نام داشت و به ملا باجي مشهور بود. او از بعضي خانواده هاي محله، چند دختر و پسر را به شاگردي مي پذيرفت. گيسواني سفيد و رويي نوراني و روحاني داشت و با محبت فراوان، اصول و فروع دين و آداب وضو و نماز و روزه و كتاب عم جزء را به شاگردانش مي آموخت. جلال الدين اين دروس را قبلاً در خانه از مادر آموخته بود، اما ملاباجي آن را تكميل كرد.
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آه ، تاکی ز سفر باز نیایی
آه ، تاکی ز سفر باز نیایی ، بازآ اشتیاق تو مرا سوخت کجایی، بازآ
شده نزدیک که هجران تو، مارا بکشد گرهمان بر سرخونریزی مایی ، بازآ
کردهای عهد که بازآیی و ما را بکشی وقت آنست که لطفی بنمایی، بازآ
رفتی و باز نمیآیی و من بی تو به جان جان من اینهمه بی رحم چرایی، بازآ
وحشی از جرم همین کز سر آن کو رفتی گرچه مستوجب سد گونه جفایی، بازآ
من آن مرغم
من آن مرغم که افکندم به دام سد بلا خود را به یک پرواز بی هنگام کردم مبتلا خود را
نه دستی داشتم بر سر، نه پایی داشتم در گل به دست خویش کردم اینچنین بی دست و پا خود را
چنان از طرح وضع ناپسند خود گریزانم که گر دستم دهد از خویش هم سازم جدا خود را
گر این وضع است میترسم که با چندین وفاداری شود لازم که پیشت وانمایم بیوفا خود را
چو از اظهار عشقم خویش را بیگانه میداری نمیبایست کرد اول به این حرف آشنا خود را
ببین وحشی که در خوناب حسرت ماند پا در گل کسی کو بگذراندی تشنه از آب بقا خود را
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به نام خداوند بخشنده بخشايشگر
خداوند رحمان، (1 قرآن را تعليم فرمود، (2 انسان را آفريد، (3 و به او «بيان» را آموخت. (4 خورشيد و ماه با حساب منظمى مىگردند، (5 و گياه و درخت براى او سجده مىكنند! (6 و آسمان را برافراشت، و ميزان و قانون (در آن( گذاشت، (7 تا در ميزان طغيان نكنيد (و از مسير عدالت منحرف نشويد(، (8 و وزن را بر اساس عدل برپا داريد و ميزان را كم نگذاريد! (9 زمين را براى خلايق آفريد، (10 كه در آن ميوهها و نخلهاى پرشكوفه است، (11 و دانههايى كه همراه با ساقه و برگى است كه بصورت كاه درمىآيد، و گياهان خوشبو! (12 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (شما اى گروه جن و انس(؟! (13 انسان را از گل خشكيدهاى همچون سفال آفريد، (14 و جن را از شعلههاى مختلط و متحرك آتش خلق كرد! (15 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (16 او پروردگار دو مشرق و پروردگار دو مغرب است! (17 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (18 دو درياى مختلف (شور و شيرين، گرم و سرد( را در كنار هم قرار داد، در حالى كه با هم تماس دارند; (19 در ميان آن دو برزخى است كه يكى بر ديگرى غلبه نمىكند (و به هم نمىآميزند(! (20 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (21 از آن دو، لؤلؤ و مرجان خارج مىشود. (22 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (23 و براى اوست كشتيهاى ساخته شده كه در دريا به حركت درمىآيند و همچون كوهى هستند! (24 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (25 همه كسانى كه روى آن ( زمين( هستند فانى مىشوند، (26 و تنها ذات ذوالجلال و گرامى پروردگارت باقى مىماند! (27 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (28 تمام كسانى كه در آسمانها و زمين هستند از او تقاضا مىكنند، و او هر روز در شان و كارى است! (29 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (30 بزودى به حساب شما مىپردازيم اى دو گروه انس و جن! (31 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (32 اى گروه جن و انس! اگر مىتوانيد از مرزهاى آسمانها و زمين بگذريد، پس بگذريد، ولى هرگز نمىتوانيد، مگر با نيرويى (فوق العاده(! (33 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (34 شعلههايى از آتش بىدود، و دودهايى متراكم بر شما فرستاده مىشود; و نمىتوانيد از كسى يارى بطلبيد! (35 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (36 در آن هنگام كه آسمان شكافته شود و همچون روغن مذاب گلگون گردد (حوادث هولناكى رخ مىدهد كه تاب تحمل آن را نخواهيد داشت(! (37 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (38 در آن روز هيچ كس از انس و جن از گناهش سؤال نمىشود (و همه چيز روشن است(! (39 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (40 مجرمان از چهرههايشان شناخته مىشوند; و آنگاه آنها را از موهاى پيش سر، و پاهايشان مىگيرند (و به دوزخ مىافكنند(! (41 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (42 اين همان دوزخى است كه مجرمان آن را انكار مىكردند! (43 امروز در ميان آن و آب سوزان در رفت و آمدند! (44 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (45 و براى كسى كه از مقام پروردگارش بترسد، دو باغ بهشتى است! (46 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (47 آن دو باغ بهشتى( داراى انواع نعمتها و درختان پرطراوت است! (48 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (49
در آنها دو چشمه هميشه جارى است! (50 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (51 در آن دو، از هر ميوهاى دو نوع وجود دارد (هر يك از ديگرى بهتر(! (52 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (53 اين در حالى است كه آنها بر فرشهايى تكيه كردهاند با آسترهائى از ديبا و ابريشم، و ميوههاى رسيده آن دو باغ بهشتى در دسترس است! (54 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (55 در آن باغهاى بهشتى زنانى هستند كه جز به همسران خود عشق نمىورزند; و هيچ انس و جن پيش از اينها با آنان تماس نگرفته است. (56 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (57 آنها همچون ياقوت و مرجانند! (58 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (59 آيا جزاى نيكى جز نيكى است؟! (60 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (61 و پايين تر از آنها، دو باغ بهشتى ديگر است. (62 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (63 هر دو خرم و سرسبزند! (64 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (65 در آنها دو چشمه جوشنده است! (66 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (67 در آنها ميوههاى فراوان و درخت خرما و انار است! (68 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (69 و در آن باغهاى بهشتى زنانى نيكو خلق و زيبايند! (70 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (71 حوريانى كه در خيمههاى بهشتى مستورند! (72 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (73 هيچ انس و جن پيش از ايشان با آنها تماس نگرفته (و دوشيزهاند(! (74 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (75 اين در حالى است كه بهشتيان بر تختهايى تكيه زدهاند كه با بهترين و زيباترين پارچههاى سبزرنگ پوشانده شده است. (76 پس كدامين نعمتهاى پروردگارتان را انكار مىكنيد؟! (77 پربركت و زوالناپذير است نام پروردگار صاحب جلال و بزرگوار تو! (78
باب چهارم : در فوايد خاموشى
حکايت
يکی را از دوستان گفتم : امتناع سخن گفتنم بعلت آن اختيار آمده است در غالب اوقات که در سخن نيک و بد اتفاق افتد و ديده دشمنان جز بر بدی نمی آيد . گفت : دشمن آن به که نيکی نبيند .
هنر به چشم عداوت ، بزرگتر عيب است گل است سعدى و در چشم دشمنان خار است
نور گيتى فروز چشمه هور زشت باشد به چشم موشك كور
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حکايت
بازرگانى را هزار دينار خسارت افتاد . پسر را گفت : نبايد که اين سخن با کسی درميان نهی . گفت : ای پدر ، فرمان توراست ، نگويم ولی مرا بر فايده اين مطلع گردانی که مصلحت در نهان داشتن چيست ؟ گفت : تا مصيبت دو نشود يکی نقصان مايه و ديگر شماتت همسايه.
مگوى انده خويش با دشمنان كه لا حول گويند شادى كنان
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شيخ گفت : اى عبدالكريم !حكايت نويس مباش ؛ چنان باش كه از تو حكايت كنند
باب سوم : در فضيلت قناعت
حکايت
خواهنده مغربی در صف بزازان حلب می گفت :ای خداوندان نعمت ، اگر شما را انصاف بودی و ما را قناعت ، رسم سوال از جهان برخاستی .
اى قناعت ! توانگرم گردان كه وراى تو هيچ نعمت نيست
گنج صبر، اختيار لقمان است هر كه را صبر نيست ، حكمت نيست
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حکايت
درويشی را شنيدم که در آتش فاقه می سوخت و رقعه بر خرقه همی دوخت و تسکين خاطر مسکين را همی گفت :
به نان قناعت كنيم و جامه دلق كه بار محنت خود به ، كه بار منت خلق
کسی گفتش : چه نشينی که فلان درين شهر طبعی کريم دارد و کرمی عميم ، ميان به خدمت آزادگان بسته و بر در دلها نشسته . اگر بر صورت حال تو چنانکه هست وقوف يابد پاس خاطر عزيزان داشتن منت دارد و غنيمت شمارد . گفت : خاموش که در پسی مردن ، به که حاجت پيش کسی بردن .
همه رقعه دوختن به و الزام كنج صبر كز بهر جامه ، رقعه بر خواجگان نبشت
حقا كه با عقوبت دوزخ برابر است رفتن به پايمردى همسايه در بهشت
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حکايت
يکی از ملوک طبيبی حاذق به خدمت مصطفی صلی الله عليه و سلم فرستاد . سالی در ديار عرب بود و کسی تجربه پيش او نياورد و معالجه از وی در نخواست . پيش پيغمبر آمد و گله کرد که مرين بنده را برای معالجت اصحاب فرستاده اند و درين مدت کسی التفاتی نکرد تا خدمتی کله بر بنده معين است بجای آورد . رسول عليه السلام گفت : اين طايفه را طريقتست که تا اشتها غالب نشود نخورد و هنوز اشتها باقی بود که دست از طعام بدارند . حکيم گفت : اين است موجب تندرستی. زمين ببوسيد و برفت.
سخن آنگه كند حكيم آغاز يا سر انگشت سوى لقمه دراز
كه ز ناگفتنش خلل زايد يا ز ناخوردنش به جان آيد
لاجرم حكمتش بود گفتار خوردش تندرستى آرد بار
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حکايت
در سيرت اردشير بابکان آمده است که حکيم عرب را پرسيد که روزی چه مايه طعام بايد خوردن ؟ گفت : صد درم سنگ کفايت است . گفت : اين قدر چه قوت دهد ؟ گفت : هذا المقدار يحملک و مازاد علی ذلک فانت حامله يعنی اينقدر تو را برپای همی دارد و هر چه برين زيادت کنی تو حمال آنی .
خوردن براى زيستن و ذكر كردن است تو معتقد كه زيستن از بهر خوردن است
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بهاء الدين محمد بن عزالدين حسين بن عبدالصمد بن شمس الدين محمد بن حسن بن محمد بن صالح حارثي همداني عاملي جبعي (جباعي) معروف به شيخ بهائي در سال 953 ه.ق 1546 ميلادي در بعلبك متولد شد. او در جبل عامل در ناحيه شام و سوريه در روستايي به نام "جبع" يا "جباع" مي زيسته و از نژاد "حارث بن عبدالله اعور همداني" متوفي به سال 65 هجري از معاريف اسلام بوده است.
ناحيه "جبل عامل" همواره يكي از مراكز شيعه در مغرب آسيا بوده اس



